Tuesday, December 2, 2008

आग जलना चाहता हु ........

वो रात दीन देखता रहा,
वो ज़ख्म खाए बैठा है,
वो मरहम नही लगा रहा,
वो आग जलाने बैठा है.....

वो ज़िंदगी उजड़ते देख रहा ,
वो खून को सीच रहा,
वो कभी चुप रहना चाहता है,
वो आग जलाने बैठा है.....

वो ज़ख्म का है करवा ,
वो सहन कर रहा दर्द को,
वो रात दीन जाग रहा ,
वो आग जलाने बैठा है.....

वो उठ खड़ा हो गया,
वो चला है काँटों को राह पर,
वो है आंसुओ का है कारवा
वो आग जलाने बैठा है.....



मुंबई हमलो मैं शहीद हो गए लोगो को मेरा साला


ऋषभ शुक्ला

5 comments:

sumit said...

abey hindi sudhar le mere angrezzzzz

RISHABH SHUKLA said...

SRRY SIR BUT THIS IS COMPUTER N I M NEW IN TYPING HINDI............SO PLZ DONN MIND....

sumit said...

watever boy....d poem waz gudd n its d heart dat matters...keep goin

Vikas Bajpai said...

right said Sumit..he is such a clean hearted guy but still i dont know why few people dont understand him and they run in search of others....
मैंने इस छोटी से लाइन में बहोत कुछ लिखा है , समझने वाले समझ जाएँ , न समझने वाले plzz dont waste their time.......

paramveer said...

r8 job yaar.poem is really gud